WhatsApp Forwarded Osho Quotes in Hindi 2022

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विज्ञान कहता है : समय को बढ़ा लो। धर्म कहता है : समझ को जगा लो। विज्ञान कहता है : उम्र लम्बी हो,सब ठीक हो जाएगा। धर्म कहता है : बोध गहरा हो,सब ठीक हो जाएगा। वासना समय कि लम्बाई से न कटेगी, बोध की गहराई से कटेगी।

ओशो
Osho Quotes
Osho Quotes

जीवन की वास्तविक यात्रा में,
आपका अपना अंतर्ज्ञान ही,
आपका एकमात्र शिक्षक है।


ओशो

तुम “विधि” बदलने को तैयार हो
“शास्त्र” बदलने को तैयार हो
“धर्म” बदलने को तैयार हो
“गुरु” बदलने को तैयार हो
लेकिन.. !
“खुद को बदलने को तैयार नहीं”
तुम कभी नहीं पूछते !
“ऐसा तो नहीं कि मैं गलत हूँ”

ओशो

मैं लगा रहा ताउम्र
परिस्थितिया बदलने मे ग़ालिब ,

जिस दिन मनोस्थिति बदली
परिस्थितिया खुद ब खुद बदल गयी

देखे अपने आपको

बीमारिया दो तरह की हो सकती हे

एक शरीर की बीमारी
एक मन की बीमारी

शरीर की बीमारी
के लिए औषधि
काम कर सकती है

पर मन की बीमारी
आपके विचारो

आप के जो पूर्वग्रह
पुराने विचारो को
पकड़ कर बैठे हो

क्या सही क्या गलत
पृथ्वी पर क्या होना
चाहिए क्या नहीं

कोय तुमसे पूछेगा
पृथ्वी अपने आप चलेगी

तुम जब नहीं नहीं थे तब भी
और आगे जब
तुम नहीं होंगे तब भी

कितने सम्राट आये और चले गये

पृथ्वी केलिए कोय
सम्राट नहीं कोय गुलाम नहीं

आप जन्म से पहले पृथ्वी पर नहीं थे
और मोत के बाद पृथ्वी पर नहीं रहेंगे

फिर केसी चिंता
फिर कैसा तनाव

फिर क्या मान क्या अपमान
फिर क्या गरीबी क्या अमीरी
फिर क्या हिन्दू क्या मुस्लिम

क्यों अपनेको को किसी
एक संप्रदाय , देश ,
या जाती से बांधे रखे हुए हो

आप सिर्फ प्रवासी हो और
पृथ्वी पर आकर
भूल गये हो क्यों आये थे

जागो छोड़ो सब मान्यताये जूठी
सब तुम ने जो पैदा की है

पृथ्वी या अंतरिक्ष को कोय फर्क नहीं
पड़ता तुम दुखी रहो या सुखी

और तुम समजते हो पूरी
पृथ्वी तुम्हारे कारन चल रही है

मैं लगा रहा ताउम्र
परिस्थितिया बदलने मे ग़ालिब ,

जिस दिन मनोस्थिति बदली
परिस्थितिया खुद ब खुद बदल गयी।

ओशो

हर दिल एक घाटी है। यदि तुम इसमें प्रेम उंडेलो, यह जवाब देगा।
प्रेम का कोई भी अवसर मत खोओ। यहां तक कि एक गली में से गुजरते हुए तुम प्रेमपूर्ण हो सकते हो। यहां तक कि तुम भिखारी के साथ भी प्रेमपूर्ण हो सकते हो। कोई जरूरत नहीं है कि तुम्हें उसे कुछ देना है, तुम कम से कम मुस्कुरा सकते हो। इसमें कुछ खर्च नहीं होता लेकिन तुम्हारी मुस्कान तुम्हारे दिल को खोलती है, तुम्हारे दिल को अधिक जीवित बनाती है। किसी का हाथ पकड़ो––चाहे दोस्त हो या अजनबी। इंतजार मत करो कि जब सही व्यक्ति होगा केवल तभी तुम प्रेम करोगे। तो फिर सही व्यक्ति कभी नहीं होगा। प्रेम किए जाओ। जितना अधिक तुम प्रेम करोगे, उतना सही व्यक्ति के आने की संभावना है क्योंकि तुम्हारा हृदय खिलना शुरू होता है। खिलता हुआ हृदय कई मधुमक्खियों, कई प्रेमियों को आकर्षित करता है।

ओशो
Osho Quote in Hindi
Osho Quote in Hindi

गौतम बुद्ध
दार्शनिक नहीं हैं।

मेटाफिजिक्स और
परलोक के प्रश्नों में

उनकी जरा भी
जरा भी-रुचि नहीं है।

उनकी रुचि है मनुष्य
के मनोविज्ञान में।

उनकी रुचि है
मनुष्य के रोग में

और मनुष्य के उपचार में।
बुद्ध ने जगत को एक
उपचार का शास्त्र दिया है।

वे मनुष्य जाति के
पहले मनोवैज्ञानिक हैं।

इसलिए बुद्ध को समझने में
ध्यान रखना,

सिद्धांत या सिद्धांतों के
आसपास तर्कों का जाल

उन्होंने जरा भी
खड़ा नहीं किया है।

उन्हें कुछ सिद्ध
नहीं करना है।

न तो परमात्मा को
सिद्ध करना है,

न परलोक को
सिद्ध करना है।

उन्हें तो आविष्कृत करना है,
निदान करना है।

मनुष्य का रोग कहां है ?
मनुष्य का रोग क्या है ?

मनुष्य दुखी क्यों है ?
यही बुद्ध का मौलिक प्रश्न है।

परमात्मा है या नहीं
संसार किसने बनाया, नहीं बनाया

आत्मा मरने के
बाद बचती है या नहीं

निर्गुण है परमात्मा
या सगुण इस तरह

की बातों को
उन्होंने व्यर्थ कहा है।

और इस तरह की
बातों को उन्होंने
आदमी की चालाकी कहा है।

ये जीवन के असली सवाल से
बचने के उपाय हैं।

ये कोई सवाल नहीं हैं।
इनके हल होने
से कुछ हल नहीं होता।

नास्तिक मानता है
ईश्वर नहीं है,

तो भी वैसे ही जीता है।

आस्तिक मानता है ईश्वर है,
तो भी उसके जीवन
में कोई भेद नहीं।

अगर नास्तिक और
आस्तिक के जीवन को देखो

तो तुम एक सा पाओगे।
तो फिर उनके
विचारों का क्या परिणाम है ?

परलोक है या नहीं,
इससे तुम नहीं बदलते।

और बुद्ध कहते हैं,
जब तक तुम न बदल जाओ,

तब तक समय व्यर्थ ही गंवाया।
बुद्ध की उत्सुकता तुम्हारी

आंतरिक क्रांति में है।
बुद्ध बार-बार कहते थे,

कि मनुष्य की दशा
उस आदमी जैसी है

जो एक अनजानी राह से
गुजरता था और एक तीर
आकर उसकी छाती में लग गया।

वह गिर पड़ा है।
लोग आ गए हैं।

लोग उसका तीर
निकालना चाहते हैं।

लेकिन वह कहता है, ठहरो!
पहले मुझे यह पता चल
जाए कि तीर किसने मारा।

ठहरो, पहले मुझे यह
पता चल जाए कि तीर
उसने क्यों मारा।

ठहरो, मुझे यह
पता चल जाए कि तीर
आकस्मिक रूप से लगा है

या सकारण।

ठहरो, मुझे यह पता
चल जाए कि तीर
विषबुझा है, या बिन-विषबुझा।

बुद्ध ने कहा,
वह आदमी दार्शनिक रहा होगा।
वह बड़े ऊंचे सवाल उठा रहा है।

लेकिन जो लोग इकट्ठे थे
उन्होंने कहा,

यह सवाल तुम पीछे पूछ लेना।
पहले तीर निकाल लेने दो,

अन्यथा पूछने वाला
मरने के करीब है।

उत्तर भी मिल जाएंगे तो
हम किसे देंगे ?

और अभी इन प्रश्नों
की कोई आत्यंतिकता नहीं है।

अभी तीर खींच लेने दो।
तीर छाती में लगा है, खतरा है।
तुम ज्यादा देर न बच सकोगे।

बुद्ध कहते,
ऐसी ही दशा में मैं तुम्हें पाता हूं।

और तुम पूछते हो कि
संसार किसने बनाया ?

पहले इसका पता चल जाए,
तब करेंगे ध्यान। क्यों बनाया ?

पहले इसका पता चल जाए,
तब बदलेंगे जीवन को।

क्या कारण है परमात्मा
का संसार बनाने में ?

क्यों यह लीला उसने रची ?
जब तक इसका पता न चल जाए,

तब तक हम
मंदिर में प्रवेश न करेंगे।

बुद्ध कहते हैं,
जीवन का तीर छाती में चुभा है।

पल-पल मर रहे हो।
किसी भी क्षण डूब जाओगे।

ये उत्तर, ये प्रश्न, सब व्यर्थ हैं।
अभी तो एक ही बात
पूछो कि कैसे यह तीर निकल आए।

बुद्ध पहले मनुष्य हैं
जिन्होंने परमात्मा के बिना
ध्यान करने की विधि दी।

जिन्होंने परमात्मा की मान्यता
को ध्यान के लिए आवश्यक न माना।

और न केवल परमात्मा की
बल्कि आत्मा की धारणा को भी

ध्यान के लिए आवश्यक न माना।
उन्होंने कहा, ध्यान तो स्वास्थ्य है।

तुम स्वस्थ हो सकते हो।
फिर शेष तुम खोज लेना।

मैं तुम्हें रोग से
मुक्त करने आया हूं

ओशो

जीवन में जो छोटी छोटी बातों में
विराट के दर्शन पा ले,
वही बुद्धिमान है।

जो अणु में असीम की
झलक पा ले वहीं बुद्धिमान है।

क्षुद्र में जिसे क्षुद्रता न दिखायी पड़े,
क्षुद्र में भी उसे देख ले जो सर्वात्मा है,
वही बुद्धिमान है।

जीवन के सत्य कहीं दूर
आकाश में नहीं छिपे हैं।

जीवन के सत्य यहीं लिखे
पड़े हैं चारों तरफ।

पत्ते पत्ते पर और कण कण
पर जीवन का वेद लिखा है।

देखने वाली आंख हों तो
वेदों में पढ़ने की जरूरत ही नहीं है,

क्योंकि महावेद तुम्हारे चारों
तरफ उपस्थित हुआ है।

तुम्हारे ही जीवन की घटनाओं
में सत्य ने हजार हजार रंग रूप लिए हैं।

किसी अवतार के जीवन में
जाने की जरूरत नहीं हैं।

तुम्हारे भीतर भी
परमात्मा अवतरित हुआ है।

अगर तुम ठीक से देखना शुरू करो
जिसे बुद्ध सम्यक दृष्टि कहते हैं,

ठीक ठीक देखना तो ऐसे बूंद बूंद
इकट्ठे करते करते तुम्हारे भीतर भी
अमृत का सागर इकट्ठा हो जाएगा।

और बूंद बूंद ही सागर भरता है।
बूंद को इनकार मत करना,
नहीं तो सागर कभी नहीं भरेगा।

यह सोचकर बूंद को
इनकार मत कर देना कि
बूंद में क्या रखा है !

हम सागर चाहते हैं,
बूंद में क्या रखा है !
जिसने बूंद को अस्वीकारा,

वह सागर से भी वंचित रह जाएगा,
क्योंकि सागर बनता बूंद से है।

जीवन के छोटे छोटे फूलों को
इकट्ठा करना ही काफी नहीं है,

इन्हें बोध के धागे में पिरोओ
कि इनकी माला बने।

कुछ लोग इकट्ठा भी कर लेते हैं
जीवन के अनुभव को,

लेकिन उस अनुभव से
कुछ सीख नहीं लेते।

तो ढेर लग जाता है फूलों का,
लेकिन माला नहीं बनती।

जब तुम्हारे जीवन के बहुत से
अनुभवों को तुम एक ही
धागे में पिरो देते हो,

जब तुम्हारे जीवन के बहुत से
अनुभव एक ही दिशा में
इंगित करने लगते हैं,

तब तुम्हारे जीवन
में सूत्र उपलब्ध होता है।

ओशो
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